भारत के कई राज्यों की तरह झारखंड भी अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और खान-पान के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इसके साथ ही यहाँ की लोककथाओं और भूतिया घटनाओं का भी अपना इतिहास है। गाँव-गाँव में ऐसी दास्तानें सुनने को मिलती हैं जहाँ आत्माओं का वास बताया जाता है। यह कहानी भी ऐसी ही एक घटना पर आधारित है।
गर्मियों की छुट्टियों का किस्सा

मैं करीब 13 साल की थी, जब हर साल की तरह गर्मी की छुट्टियाँ बिताने अपने दादी के गाँव, हजारीबाग गई थी। दादी का घर एक पुराने मोहल्ले में था। घर के सामने ही एक बड़ा-सा कच्चा बंगला था जिसमें एक वृद्धा रहती थीं, जिन्हें सब लोग “सरस्वती दीदी” कहते थे।
दीदी गाँव में बेहद सम्मानित थीं और दादी की भी बहुत करीबी थीं। दादी उन्हें अक्सर कपड़े सिलकर देतीं और त्योहारों पर उनके लिए खास सलवार-कुर्ता बनातीं, जिसमें हमेशा एक जेब होती थी। सरस्वती दीदी को उसमें पैसे रखने की आदत थी।
बीमारी और मौत

धीरे-धीरे सरस्वती दीदी बहुत बीमार पड़ गईं। उनका परिवार सही इलाज करवाने के बजाय लापरवाह रहा। दादी चाहती थीं कि उनका ख्याल रखें, लेकिन दीदी का बेटा और बहू उन्हें घर से भगा देते थे। कुछ ही दिनों बाद सरस्वती दीदी की मौत हो गई।
अंतिम संस्कार से पहले दादी ने उन्हें उनका पसंदीदा पीला सलवार-कुर्ता पहनाया। लेकिन ग़म की हालत में वे उस कपड़े में जेब लगाना भूल गईं। अंततः उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया।
आत्मा की वापसी

दो दिन बाद, जब दादी सुबह घर का दरवाज़ा खोल रही थीं, तभी उन्होंने देखा—सरस्वती दीदी सामने खड़ी हैं, उसी पीले कपड़े में। उन्होंने दादी से कहा,
“देखो, मैं कैसी लग रही हूँ? लेकिन इस बार तुमने मेरे कपड़ों में जेब क्यों नहीं बनाई? तुम्हें पता है, मुझे पैसे रखने की आदत है।”
दादी घबरा गईं और चिल्ला उठीं। जब हम सब दौड़कर आए तो वहाँ कोई नहीं था। दादी ने कहा कि उन्होंने अपनी आँखों से दीदी को देखा है।
उस दिन के बाद से दादी को बार-बार सरस्वती दीदी की परछाई दिखने लगी—कभी पेड़ पर बैठी हुईं, तो कभी बंगले के आँगन में टहलती हुईं।
आत्मा का साया
एक रात करीब तीन बजे दादी की नींद टूटी। खिड़की के पास से अजीब आवाज़ें आ रही थीं। जैसे ही उन्होंने बाहर झाँका, दीदी की आत्मा फिर दिखाई दी। डर के मारे दादी बेहोश हो गईं। उसी पल ऐसा लगा मानो वह आत्मा दादी के शरीर में समा गई हो।
इसके बाद दादी का व्यवहार बदल गया। वो हम सब पर चिल्लातीं, अजीब बातें करतीं और उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई। घरवालों को समझ में आ गया कि यह कोई आत्मिक असर है।
पंडित का उपाय और मोक्ष

आखिरकार, घरवालों ने पास के एक पंडित को बुलाया। पंडितजी ने कहा,
“जब किसी की मृत्यु की विधि अधूरी रह जाती है, तो आत्मा भटकती है और अपने प्रियजन के शरीर में वास कर लेती है। जब तक शांति हवन और सही रीति-रिवाज़ से पूजा न हो, आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता।”
शुरुआत में सरस्वती दीदी का परिवार इसे अंधविश्वास मानकर टालने लगा। लेकिन जब दादी की हालत बिगड़ती गई, तो वे भी मान गए। सबने मिलकर पंडितजी से हवन करवाया और विधिपूर्वक पूजा संपन्न करवाई।
कुछ ही दिनों में दादी बिल्कुल ठीक हो गईं। और उसके बाद सरस्वती दीदी की आत्मा कभी दिखाई नहीं दी। उन्हें आखिरकार मोक्ष मिल गया था।
आज भी याद आती है वह रात
मेरी छुट्टियाँ खत्म हो गईं और हम वापस लौट आए। दादी धीरे-धीरे स्वस्थ हो गईं, लेकिन वह अनुभव हमारे पूरे परिवार की यादों में हमेशा के लिए बस गया। आज भी जब उस घटना को याद करती हूँ, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।